शनिवार, 11 सितंबर 2021

सुनार हॉल मार्किंग यूनिक आई डी (HUID) से क्यो डरता है?*

 *सुनार हॉल मार्किंग यूनिक आई डी (HUID) से क्यो डरता है?*

    


           प्रदीप कुमार नायक

            स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

मान लीजिये आप सुनार के पास गए आपने *10 ग्राम प्योर सोना 50000 रुपये का खरीदा।* 

उस सोने को लेकर आप सुनार के पास हार बनवाने गए। सुनार ने आपसे 10 ग्राम सोना लिया और कहा की 2000 रुपये बनवाई लगेगी। 

आपने *खुशी* से कहा ठीक है। उसके बाद सुनार ने *1 ग्राम सोना निकाल लिया* और 1 ग्राम का *टांका* लगा दिया। क्योंकि बिना टांके के आपका हार बन ही नहीं सकता। 


*यानी की 1 ग्राम सोना 3000 रुपये का निकाल लिया* और 2000 रुपये आपसे *बनवाई अलग से* लेली। 


यानी आपको *5000 रुपये का झटका* लग गया। अब आपके *50 हजार* रुपये सोने की कीमत मात्र *45 हजार* रुपये बची और सोना भी *1 ग्राम कम कम हो कर 9 ग्राम शेष बचा ।*  


बात यहीं खत्म नही हुई। उसके बाद *अगर* आप पुन: अपने सोने के हार को बेचने या कोई और आभूषण बनवाने पुन: उसी सुनार के पास जाते हैं तो वह पहले टांका काटने की बात करता है और सफाई करने के नाम पर *0.5 ग्राम सोना* और कम हो जाता है। 


अब आपके पास मात्र *8.5 ग्राम* सोना ही बचता है। यानी की *50 हजार* का सोना मात्र *43500* रुपये का बचा।


आप जानते होंगे कि,


*50000 रुपये का सोना + 2000 रुपये बनवाई 52000 रुपये ।*


*1 ग्राम का टांका कटा 3000 रुपए + 0.5 ग्राम पुन: बेचने या तुड़वाने पर कटा मतलब सफाई के नाम पर = 1500/=*


*शेष बचा सोना 8.5 ग्राम*


*यानी कीमत 52000 - 6500 का घाटा  .....= 45500 रुपये*


*भारत सरकार की मंशा क्या है ?*


*HUID* लगने पर सुनार को रसीद के आधार पर उपभोक्ता को पूरा सोना देना होगा। 

और जितने ग्राम का टांका लगेगा उसका *सोने के तोल* पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जैसा कि आपके सोने की तोल *10 ग्राम* है और टाका *1 ग्राम* का लगा तो सुनार को रसीद के आधार पर *11 ग्राम* वजन करके उपभोक्ता को देना होगा। इसीलिए सुनार हड़ताल पर है कि अब उनका *धोखाधड़ी* का *भेद* खुल जायेगा।

*HUID वाली ज्वेलरी* को सोने के मार्किट भाव से ज्यादा बेचने और मिलावट करने पर सुनार को अपनी ज्वेलरी ताजे सोने के मार्किट भाव वापस खरीदनी पड़ेगी। यानी खुद का लड्डू खुद खाना पड़ेगा। ग्राहक HUID वाली ज्वेलरी किसी भी सुनार को बेच सकता है, जिसे कोई भी सुनार मना नहीं कर सकता। यानी एक सुनार दूसरे सुनार के पापो का फल भोगेगा।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

प्याज और लहसुन पाप को बढ़ाता है

 प्याज और लहसुन पाप को बढ़ाता हैं

               


  

 प्रदीप कुमार नायक

               स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार


*देवताओं को प्याज और लहसुन का भोग क्यों नही लगाया जाता? क्यों प्याज और लहसुन को शाकाहार नही माना जाता ? क्या यह राक्षसी भोजन है? आओ ! इस संबंध में एक धार्मिक कहानी का आनंद लें।* 

*"बात समुद्र मंथन के समय की है। समुद्र मंथन से जब अमृत निकला तो अमृत पीने के लिए देवताओं व राक्षसों में छीना-झपटी होने लगी। तब मोहिनी रूप धर भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृतपान कराने के उद्देश्य से राक्षसों को भ्रमित कर अमृत बांटना शुरू कर दिया। राहु नामक एक राक्षस को मोहिनी पर जब संदेह हुआ तो वह चुपके देवताओं की पंक्ति में भेष बदल कर बैठ गया। अमृत बांटते बांटते मोहिनी के रूप में भगवान विष्णु भी उस राक्षस को नही पहिचान पाये और उसे भी अमृत दे दिया। परंतु तत्काल सूर्य और चंद्र के पहचानने पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया। सिर कटते ही अमृत की कुछ बूंदें उस राक्षस के मुंह से रक्त के साथ नीचे जमीन में गिरी, जिनसे प्याज और लहसुन की उत्पत्ति हुई। अमृत से पैदा होने के कारण प्याज और लहसुन रोगनाशक व जीवनदायिनी है। परंतु राक्षसी रक्त के मिश्रण के कारण इसमें राक्षसी गुणों का समावेश हो गया है। इनके सेवन से शरीर राक्षसों की तरह बलिष्ठ होता है। ये उत्तेजना, क्रोध, हिंसा अशांति व पाप में वृद्धि करते है। इसलिए इसे राक्षसी भोजन माना गया है। रोगनाशक व जीवनदायिनी होने के बाद भी यह पाप को बढ़ाता है और बुद्धि को भ्रष्ट कर अशांति को जन्म देता है। इसलिए प्याज और लहसुन को अपवित्र मान कर इनका धार्मिक कार्यों में प्रयोग वर्जित है तथा देवी-देवताओं को इनका भोग नही लगाया जाता।

आपको ये लेख पढ़कर कैसा लगा अपने विचार comment ज़रूर करें। 

सोमवार, 6 सितंबर 2021

मृत्युभोज

 मृत्युभोज एक वीभत्स कुरीति

 मृत्युभोज का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए



प्रदीप कुमार नायक

 स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

 क्या सम्भव है मौत के बाद पुनः जीवन ? क्या होती है मौत के बाद ? यह सवाल सदा से ही जिज्ञासा का विषय रहा हैं।किन्तु फिर भी आजतक इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया हैं। भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते है कि आत्मा अजर अमर हैं।आत्मा का नाश नहीं हो सकता।आत्मा केवल युगों-युगों तक शरीर बदलती हैं।आत्मा का देह त्याग करने के बाद भौतिक जीवन में बहुत से संस्कार किए जाते हैं।जिनमें मृत्युभोज या तेरहवीं हैं।

    हिन्दू समाज में जब किसी परिजन की मौत हो जाती हैं,तो अनेक रस्में निभाई जाती हैं।उनमें सबसे आखिरी रस्म के तौर पर मृत्युभोज देने की परम्परा निभाई जाती हैं।जिसके अंतर्गत गाँव, मोहल्ले,पड़ोसी, मित्रगण, रिश्तेदार, आमंत्रित अथितियों के सभी लोगों को भोज देकर भोजन कराया जाता हैं।दशकों पहले मृत्यु होने पर केवल ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता था।लेकिन बदलते समय में समाज के साथ जुड़ाव या लोक लज्जा के कारण भी लोग मृत्युभोज का आयोजन करते हैं।इस भोज के अलग-अलग तरीके हैं।कहीं पर यह एक ही दिन में किया जाता हैं।कहीं पर चलता रहता हैं।कहीं तीसरे दिन से शुरू होकर बारहवें-तेरहवें दिन तक चलता रहता हैं।हमनें यहाँ तक देखा कि कई लोग श्मशान घाट से ही सीधे भोजन करने चल पड़ते हैं।कहीं-कहीं तो मोहल्ले के लोग,मित्र और रिश्तेदार भोज में शामिल होते हैं , कहीं गाँव तो कहीं पूरा क्षेत्र।तब यह हैसियत दिखावें का असर बन जाता हैं।आस-पास के कई क्षेत्र एवं गांवों से लोग गिद्दों की तरह इस घृणित भोज पर टूट पड़ते हैं।मूर्ख तो मूर्ख परन्तु शिक्षित व्यक्ति भी इस जाहिल कार्य में शामिल होते हैं।

   अधिकतर लोग मृत्युभोज के विषय में यह धारणा रखते हैं कि मृत्युभोज नहीं करना चाहिए।जबकि दूसरी तरफ कई लोग इसे संस्कार से जोड़कर देखते हैं।हिन्दू धर्म में मुख्य सोलह संस्कार बनाए गए है।जिनमें प्रथम संस्कार गर्भाधान एवं अन्तिम तथा सोलहवाँ संस्कार अंत्येष्टि हैं।इस प्रकार जब सत्रहवाँ बनाया ही नहीं गया तो सत्रहवाँ संस्कार तेरहवीं संस्कार कहाँ से आ गया।लेकिन महाभारत की बात करें तो मृत्युभोज से जुड़ी कई एक कहानी मिलती हैं।जिसके अनुसार श्री कृष्ण ने शोक की अवस्था में करवाए गए भोज को ऊर्जा का नाश करने वाला बताया हैं।महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती हैं।महाभारत युद्ध होने को था ।अतः श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जाकर युद्ध न करने के लिए सन्धि करने का आग्रह किया तो दुर्योधन द्वारा आग्रह ठुकराए जाने पर श्री कृष्ण को कष्ट हुआ और वह चल पड़े।दुर्योधन द्वारा श्री कृष्ण से भोजन करने के आग्रह पर श्री कृष्ण ने कहा कि " सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनै: " अर्थात हे दुर्योधन जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो,खाने वाले का मन प्रसन्न हो तभी भोजन करना चाहिए।लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वाले का मन में पीड़ा हो,वेदना हो,तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।

    अब प्रश्न है कि क्या परिवार में किसी प्रियजन की मृत्यु के पश्चात इस प्रकार से भोज देना उचित हैं? क्या यह हमारी संस्कृति का गौरव हैं की हम अपने ही परिजन का मौत को जश्न के रूप में मनाए ?अथवा उसके मौत के पश्चात हुए गम को तरह दिन बाद मृत्युभोज देकर इतिश्री कर दे?क्या परिजन की मृत्यु से हुई क्षति तेरह दिनों के बाद पूर्ण हो जाती हैं अथवा उसके बिछड़ने का गम समाप्त हो जाता हैं?क्या यह सम्भव है कि उसके गम को चंद दिनों की सीमाओं में बांध दिया जाय और तत्पश्चात खुशी का इजहार किया जाय ?क्या यह एक संवेदनशील और अच्छी परम्परा हैं?हद तब हो जाती है जब एक गरीब व्यक्ति जिसके घर पर खाने को पर्याप्त भोजन भी उपलब्ध नहीं है और उसे मृतक की आत्मा की शांति के लिए मृत्युभोज देने के लिए मजबूर किया जाता हैं और उसे किसी साहूकार या दुकानदार से कर्ज लेकर मृतक के प्रति अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं और वह हमेशा के लिए कर्ज में डूब जाता हैं।सामाजिक या धार्मिक परम्परा निभाते निभाते गरीब व्यक्ति और गरीब हो जाता हैं, कितना तर्क संगत हैं यह मृत्युभोज ? क्या तेरहवीं के दिन धार्मिक परम्पराओ का निर्वहन सूक्ष्म रूप से नहीं किया जा सकता।

जिसके फिजूल खर्च को बचाते हुए सिर्फ शोक सभा का आयोजन हो।मृतक को याद किया जाय।उसके द्वारा किये गए अच्छे कार्यो की समीक्षा की जाय।उसके न रहने से हुई क्षति का आंकलन किया जाय।सिर्फ दूर से आने वाले प्रशंसकों और रिश्तेदारों को साधारण भोजन की व्यवस्था की जाय।

        अत्यधिक खेद का विषय तो यह हैं की जब घर में कोई बुजुर्ग मरता हैं तो उसे ढ़ोल नगाड़ो,बैंड बाजों के साथ श्मशान घाट तक ले जाया जाता हैं, उसके पार्थिक शरीर को ग़ुब्बारे, झंडियों, पताकाओं जैसी अनेक वस्तुओं से सजाया जाता हैं और सब कुछ परम्पराओ के नाम पर तत्परता से किया जाता हैं।मरने वाला बुढ़ा हो या जबान,था तो परिवार का एक सदस्य ही।अतः परिजन के बिछुड़ने पर जश्न का माहौल क्यों?इन परम्पराओं को निभाने वालों में कम पढ़े लिखे या पिछड़े वर्ग से ही नहीं होते।बल्कि अच्छे परिवारों से और उच्च शिक्षित व्यक्ति भी शामिल होते हैं।क्या यह बिना सोचे समझे परम्पराओं को निभाते जाना ,लकीर पीटते जाना नहीं हैं।क्या यह हमारे रिश्तों में संवेदनशीलता का परिचायक माना जा सकता हैं ? क्या इन दकियानूसी कर्मो में फंसे रहकर हम विकास कर पाएंगे।विश्व की चाल में चाल मिला पाएंगे ?

        राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम 1960 की धारा दो में परिभाषित मृत्युभोज से संबंधित कोई भी कृत्य नहीं करने के आदेश दिए हैं।मृत्युभोज एक कानूनन अपराध हैं।प्रशासन को इस पर सख्ती करनी चाहिए।

            मृत्युभोज की कुप्रथा हर समाज के लिए घातक एवं एक वीभत्स कुरीति हैं।आखिर यह मौन हम कब तोड़ेंगे? अब समय आ गया है कि समाज अनीति और अन्याय रूपी फ़ायदे लेना बन्द करें तथा आंसुओं से भीगी दानव यानी मृत्युभोज बारहवीं या तेरहवीं जैसी सभी कुप्रथाओं को एक सिरे से वहिष्कार करें।

 लेखक -स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ,समाचार पत्र एवं चैनेल में अपनी योगदान दे रहे हैं।

मोबाइल - 8051650610

शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षक :- ज्ञान का सागर

 शीर्षक:– ज्ञान का सागर




शिक्षक वह बाती जो जलती है परमारथ के कारण ,
शिक्षक पथ प्रदर्शक जोकि ज्ञान का करते संचारण।

शिक्षक ही डूबी कश्ती को पार लगाने वाले हैं,
शिक्षक ही हमको जीवन का सार सिखाने वाले हैं।

विद्या के भंडार ग्रह की चाबी होते हैं शिक्षक,
अंधेरों के काल पुंज पर हावी होते हैं शिक्षक,
शिक्षक मानव जीवन में गागर में सागर होते हैं,
शिक्षक शिष्य के जीवन में भगवान बराबर होते हैं।

सहिष्णुता का ज्ञान कराने वाले होते हैं शिक्षक,
अनुशासन का ज्ञान कराने वाले होते हैं शिक्षक , 
शिक्षक हमको क्षमा धर्म का पाठ सिखाने वाले हैं,
शिक्षक हमको जीवन का उद्देश्य दिखाने वाले हैं।

भेदभाव की दीवारों को तोड़ने वाले हैं शिक्षक,
अंधकार के तूफानों को मोड़ने वाले हैं शिक्षक , 
शिक्षक अपने उद्यम से उत्थान राष्ट्र का करते हैं 
शिक्षक ही शिक्षा देकर कल्याण राष्ट का करते हैं ।

मैं होता हूं कलमकार  शिक्षक का वंदन करता हूं,
शब्दों की माला लेकर उनका अभिनंदन करता हूं ।।

रचनाकार: – सोनू मीना 
पता :– रायसेन मप्र

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

पत्रकारों की दुनिया

 .......पत्रकारों की दुनियां



 प्रदीप  नायक

 स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

      प्रेस,पत्रकार यानी मीडिया का काम बहुत ही जिम्मेदारी भरा हैं।मीडिया तथा पत्रकार की हर कार्य के समाज पर  अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव पड़ते हैं ।  लोकतंत्र अगर आज जिन्दा हैं तो इसमें पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान हैं।आज भले ही आप कुछ प्रिंट एवं टी.वी.चैनलों के उन्मादी कवरेज के कारण पत्रकार तथा मीडिया के खिलाफ एक नजरिया बना ले,लेकिन आप यह कैसे भूल सकते हैं कि आज भी अनेकों पत्र-पत्रिका तथा समाचार समूह सिर्फ सच को उजागर कर अपने धर्म का निर्वाह करते हुए आर्थिक मानसिक प्रताड़ना झेलना तो पसन्द करते हैं।लेकिन किसी अत्याचारी,भ्रष्टाचारी की चापलूसी करने के बजाय सदैव कुर्बानी देने को तैयार रहते हैं।इकबाल की निम्न पंक्तियां मुझे याद आ रहा हैं।जिसमे कहाँ गया हैं कि -

 तेज सा तलवार ,सादा सा कलम

बस यही दो ताकते हैं वेस या कम

एक हैं जंगी सुजात कर निशां

एक हैं इलमी लियाकत का निशां

आदमी की जिंदगी,दोंनो से हैं

 कौम की ताबदगी, दोंनो से हैं

जो नहीं डरते,कलम की मार से

कलम होता हैं सर,उनका तलवार की धार से

जंग के मैदान में,राजी बनों.

            मीडिया तथा पत्रकारों का काम तथा  एक पत्रकार का सच्चा धर्म यही हैं कि वह आम जनता तक सही तथ्य पहुंचाये चाहे वह किसी भी कीमत पर हो।भारतीय पत्रकारिता विश्व की सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता में से एक हैं।भारतीय पत्रकारिता अगर सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता हैं तो यह संयोग से या किसी की दया से नहीं हैं बल्कि इसके लिए हम में से कई लोगों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी हैं।इसके लिए कई मुकदमा लड़े गए, कई नौकरियां चली गई।पत्रकारों को लूटा गया,धमकाया गया,जेल भेजा गया और यहाँ तक कि उनकी हत्यायें भी की गई और यह भी सच हैं कि उनका मान सम्मान भी किया गया और उन्हें संसद तक मे भी भेजा गया।

      मीडिया तथा पत्रकारों को जो कुछ भी मिला हैं वह साहस व लड़ाई से ही प्राप्त हुआ हैं।यहीं कारण हैं कि हम आज भी सत्ता को अपने मैदान में घुसपैठ करने और निरर्थक मूर्खतापूर्ण तरीकों से अपनी आज़ादी पर पाबंदी लगाने से रोकने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।एक पत्रकार का काम राष्ट्र निर्माण करना नहीं बल्कि उसमें सहायता करना हैं।उसका काम जमीन से जुड़ा हैं।आम जनता तक सिर्फ सच्चाई पहुंचाना उसका धर्म हैं, चाहे वह किसी भी कीमत पर हो।सच से सत्ता नाराज हो सकती हैं, उसके निहित स्वार्थ प्रभावित हो सकते हैं।यहां तक कि सच्चाई से हम सबको धक्का लग सकता हैं।लेकिन यही तो पत्रकार का धर्म हैं।जैसे रन क्षेत्र में एक योद्धा का धर्म लड़ना होता हैं चाहे उसका कोई भी परिणाम हो।

    आज पत्रकारिता पूरी तरह बदनाम होकर रह चुकी हैं और उसके अस्तित्व ख़तरे में हैं।मीडिया का सरोकार इस बात से कतई नहीं रहता हैं कि समाज एवं सरकार को दिशा दे सके,बल्कि उसकी दखल अंदाजी बाजार एवं भ्रष्टाचार पर होती हैं।ता कि उसका संगठन चंद ही महीनों में मालो माल होना चाहती हैं।पत्रकार खबरों के बाजीगर हैं, दलाली के लिए महशूर न हो।

         पत्रकारिता एक मिशन हैं।उस मिशन के पीछे देश की सेवा और आम आदमी की आवाज़ बनकर पत्रकारिता के माध्यम से लोंगो के दिलो में सेवा भावना एवं समर्पण की परिभाषा गढ़ी जाती हैं।

                   वर्षो पहले मैं प्रदीप कुमार नायक , " स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार " ने जो जेहाद अत्याचार, भ्रष्टाचार, अन्याय,शोषण के खिलाफ छेड़ा था,वह आज भी जारी हैं।1857 से लेकर अब तक जिन योद्धाओं ने जंगे आज़ादी में कुर्बानी दी और आज़ादी के बाद भी राष्ट्र निर्माण में जिन्होंने अपने धर्म का निर्वाह करते हुए अपना योगदान दिया पत्रकार परिवार उन सभी को नत मस्तक हो अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता हैं।

   विभिन्न पत्र-पत्रिका एवं समाचार पत्र के माध्यम से हमने यहीं कहाँ हैं कि -

धरा बेच देंगे,गगन बेच देंगे,

चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे,

अगर सो गए,कलम के सिपाही,

वतन के सौदागर,वतन बेच देंगे,

    हम आपसे यही कहना चाहते हैं कि आज़ादी के 74 वर्षो बाद व स्वतंत्रता आंदोलन के 164 वर्षो बाद भी भारत अगर विश्व गुरु नहीं बन पाया हैं तो इसके लिए जो जिम्मेदार हैं, उन्हें देश द्रोही समझकर सजा देने व दिलाने के लिए हमे बिना किसी भेदभाव के आगे आना चाहिए।

    मीडिया तथा पत्रकार जिस प्रकार कुछ अपवादों को छोड़कर सच के साथ चल रहे हैं उसी प्रकार कार्य पालिका,विधायिका व न्यायपालिका को भी अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सच लिखने वाले पत्रकारों को न्याय के लिए आगे आना चाहिए और पत्रकारों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि आप सदैव " सत्यमेव जयते " के पथ पर चले और भारतीय संविधान के तहत जिन्हें राष्ट्र निर्माण की जिम्मेवारी सौपी गई हैं वे अपने धर्म का पालन करते हुए राष्ट्र निर्माण करें।

लेखक - स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं, समाचार पत्र एवं चैनल में अपनी योगदान दे रहे हैं।

 मोबाइल -  8051650610

बुधवार, 1 सितंबर 2021

राजनीति की बाढ़

 बाढ़ का सैलाव या राजनीति की बाढ़

तूफानी नदियों की बाढ़ से त्रस्त बिहार

 प्रदीप कुमार नायक  स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार




            इस साल बरसात के शुरुआती दौर में ही मानसून के छा जाने से मिथिलांचल के साथ-साथ अन्य कई क्षेत्रों में बाढ़ से नुकसान का सिलसिला चल पड़ा हैं।।गरीब-गुरबों और किसानों के लिए जहां बाढ़ का मतलब जान-माल और फसल की भारी तबाही होती हैं।वहीं मंत्रियों के लिए हवाई सर्वेक्षण तथा अधिकारियों के लिए राहत सामग्रियों की आपूर्ति के नाम पर भयानक लूट।वहीं विपक्षी पार्टियों के लिए इसका मतलब नए-नए राजनीतिक समीकरणों और जोड़-तोड़ का एक मौका होता हैं।जैसा कि जयनगर कमला बलान पर बाढ़ का पानी अंतिम निशानी पर आ जाने से बाढ़ की राजनीति पैदा कर दी हैं।इस साल बिहार के बीस जिलों के बीस लाख से अधिक लोग बाढ़ से पीड़ित हैं।

         बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा हैं, ऐसा सरकारें कहती हैं।पर लोग इसे सरकारी आपदा कहते हैं।उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाके खासकर मधुबनी,दरभंगा,समस्तीपुर जिला आज़ादी मिलने के बाद तकरीबन पच्चीस बार प्रलयकारी बाढ़ का प्रकोप झेल चुके हैं।इस बार फिर नदियों में भयंकर बाढ़ आ गई हैं।हाल में नेपाल द्वारा कोसी बैराज से लगभग 70 हजार क्यूसेक से अधिक पानी छोड़े जाने से कोसी का जल स्तर बहुत अधिक बढ़ गया।नेपाल से निकलने वाली बूढ़ी गंडक,बागमती और अधवारा समूह की नदियां भी तूफान पर हैं।कमला बलान तो अपने चरम सीमा से बाहर हैं।इसके कारण सैकडों गांवो में बाढ़ का पानी फैल गया हैं।

          नेपाल से निकलने वाली सारी नदियां बिहार के मधुबनी जिला के झंझारपुर, घोघरडीहा,अंधराठाढ़ी,फुलपरास, बाबूबरही,बेनीपट्टी, बिस्फी,राजनगर और दरभंगा जिला के हायाघाट,बिरौल,घनश्यामपुर,कुशेश्वर स्थान,अरई बृद्धिपूर,सिमरी,चमनपुर में बाढ़ से भारी तबाही मचाई हैं।बागमती नदी में अचानक पानी में लगातार ठहराव रहने के बाद फिर से जल स्तर में काफी इजाफा हो गया हैं।इससे अत्यधिक बाढ़ आने से शहर वासी संशकित हैं।जयनगर स्थित कमला नदी का जल स्तर में अचानक उछाल आया गई।कमला में आई भीषण बाढ़ की वजह से अधिक जगहों पर कमला का तटबंध टूटा हुआ अवस्थित में हैं।जिससे दर्जनों गांवों में तबाही का मंजर देखने को मिलता हैं।लेकिन सरकार द्वारा बाढ़ से बचाव का कोई सार्थक प्रयास शुरू नहीं हुआ।इन क्षेत्रों में एक बड़ी चुनौती यह हैं कि दर्जनों सड़के एवं पल आवागमन के लिए पूरी तरह ठप हैं।बाढ़ की वजह से मोबाइल फ़ोन का टॉवर भी ठीक से काम नहीं कर रहा हैं।मुख्य सड़क से पैदल रास्ते बन्द होने की वजह से ग्रामीण दाने-दाने के लिए मोहताज हैं।

        बाढ़ से प्रभावित इस क्षेत्र के निजात के लिए बाढ़ नियंत्रण के नाम पर देश के केंद्रीय जल आयोग जैसी भारी-भरकम संस्था का गठन किया गया।बाद में गंगा,सिंधु और ब्रहम पुत्र आयोगों को भी गठित किया गया।सन 1957 में इन आयोगों की रिपोर्ट आने के बाद डॉ. राधा कृष्णन के नेतृत्व में एक दल ने बाढ़ नियंत्रण के अध्ययन के लिए चीन की यात्रा की।वहां से लौटकर इस दल ने नदियों के उदगम स्थल पर बड़े-बड़े बांधों के जरिए जलाशय निर्मित कर पानी के बहाव को नियंत्रित करने तथा सिचाई व जल-विधुत उत्पादित करने के लिहाज से इन जलाशयों का उपयोग करने की महत्वाकांक्षी जलकुंडी योजना बनाई।नेपाल सरकार, भारत सरकार और उत्तरप्रदेश सरकार के पिछले शासन ने अपने हिस्से के 33 करोड़ रुपये देने से इंकार कर दिया और योजना खटाई में पड़ गई।राष्ट्रीय स्तर पर तत्कालीन केंद्रीय योजना और सिचाई मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने 03 सितंबर 1954 को लोकसभा में बाढ़ जनित समस्याओं और इसके निदान के स्वरूप पर एक वक़्तव्य दिया।जिसे बाढ़ नीति संबंधी स्वतंत्र भारत का पहला वक़्तव्य विभाजित हुआ।

           1954 में बाढ़ संबंधी एक नीति निर्धारण के अतिरिक्त समय-समय पर केन्द्रीय सरकार द्वारा बाढ़ का सामना करने के लिए अलग-अलग समितियां,कार्यकारी दल तथा आयोग आदि नियुक्त किए जाते रहें।इन समितियों ने बाढ़ संबंधी विभिन्न आयामों का विस्तृत अध्ययन किया।जिसमें बाढ़ का पूर्वानुमान,बाढ़ से पूर्व चेतावनी,बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन,बाढ़ से मुकाबला बचाव राहत कार्य तथा राहत कार्यो का प्रबंधन आदि शामिल हैं और इसके अनुरूप उन्होंने अपनी सिफारिशे भी दी।

           1964 में यह आवाज़ उठी थी कि बागमती परियोजना के लिए आवंटित रूपयों को राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में जमा कर दिया जाय ता कि वह देश के बेहत्तर कार्य में काम आए।लेकिन वह ठेकेदारों,अभियंताओं,,पदाधिकारियों एवं जन प्रतिनिधियों की जेबों की शोभा बन गए और बागमती परियोजना आजतक अभिशाप बन कर रह गई।बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए प्रदेशों की सरकारों ने नदियों के किनारे तटबंध बनाने का रास्ता अपना लिया।देखते-देखते कुकुरमुत्ते की तरह तटबंध उग आए।बिना किसी सभान्वित योजना व केंद्रीय देखरेख के कई प्रभावकारी नेता ने शाही अंदाज में तटबंध का निर्माण कराया।वेटेड पैरामीटर का कोई ख्याल नहीं रखा गया।भ्रष्ट सांसद,विधायक और मंत्री अपने चट्टे-बट्टे के साथ सरकारी धन को लूटने में मशगूल रहें।परंतु बाद के दिनों में तो तटबंधों की देख-रेख भी बन्द हो गई।

                इसी बीच जयनगर मुख्यालय से मात्र 6 किलोमोटर उत्तर नेपाल में पूर्व पश्चिम हुलाकी राजमार्ग अंतर्गत धनुषा और सिरहा जिला को जोड़ने वाली बंदीपुर के नजदीक पांच सौ मीटर लंबी कमला नदी का नया पुल उदघाटन की अंतिम तैयारी से पहले ही क्षतिग्रस्त हो गया।या यूं कहें तो यह पुल बेलगाम अफसरों एवं बेईमान ठीकेदारों के कारण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।

           बिहार की बाढ़ के लिए नेपाल ही नहीं,बल्कि हमारें सरकारी अधिकारियों की रणनीतियां भी जिम्मेवार हैं।साथ ही इसकी जिम्मेवारी राजनीतिक,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक भी हैं।चूकि बाढ़ और सुखाड़ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।इसलिए इन दोनों का समाधान जल का सामुदायिक जल संबंधन से ही सम्भव हैं।

     लेखक - स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्र एवं चैनलों में अपनी योगदान दे रहें हैं।

    : मोबाइल - 8051650610

पत्ता गोभी की सब्ज़ी बनाने की विधि

पत्ता गोभी की सब्ज़ी बनाने की विधि सामग्री: पत्ता गोभी – 1 मध्यम आकार (बारीक कटी हुई) आलू – 1–2 (क्यूब्स में कटे हुए, वैकल्पिक) हरी मिर्च – ...